नई दिल्ली। डिजिटल दौर में जब मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के जरिए कोई भी व्यक्ति घटनाओं का वीडियो बनाकर लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है, तब पत्रकार और रील मेकर के बीच अंतर को लेकर बहस तेज हो गई है। अक्टूबर 2026 में दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की कवरेज से जुड़े मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि क्या हर सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर को पत्रकार माना जा सकता है और क्या उसे पत्रकारों के समान संरक्षण दिया जाना चाहिए?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पत्रकारों और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स के बीच अंतर करना चुनौतीपूर्ण होने की बात कही। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष उन्होंने दलील दी कि मोबाइल फोन या माइक्रोफोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति विरोध स्थल पर वीडियो रिकॉर्ड कर सकता है और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित कर सकता है। उनके अनुसार, कुछ लोग अधिक व्यूज, लोकप्रियता और कमाई के लिए घटनाओं को सनसनीखेज या एकतरफा तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं।
पत्रकारिता और रील मेकिंग में क्या है अंतर?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह तय करने के लिए विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता होगी कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देश के प्रत्येक नागरिक को पत्रकार के रूप में काम करने का अधिकार भी देता है। उन्होंने पत्रकारिता के अलग-अलग वर्गों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें मान्यता प्राप्त पत्रकार, पंजीकृत मीडिया संस्थानों में कार्यरत कर्मचारी, स्वतंत्र पत्रकार, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और रील बनाने वाले लोग शामिल हैं। अदालत की टिप्पणी का मुख्य मुद्दा यह था कि सभी को एक समान पत्रकारिता संबंधी संरक्षण देने से प्रशासनिक और कानूनी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। हालांकि, इस चर्चा को पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों के बीच अंतर समझने के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
पेशेवर पत्रकारिता में आमतौर पर तथ्यों का सत्यापन, संबंधित पक्षों का पक्ष जानना, निष्पक्षता, नैतिक मानकों का पालन और प्रकाशित सामग्री के प्रति जवाबदेही महत्वपूर्ण मानी जाती है। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर रील बनाने का उद्देश्य मनोरंजन, व्यक्तिगत विचार साझा करना या अधिक दर्शकों तक पहुंचना भी हो सकता है। हालांकि, सोशल मीडिया पर काम करने वाला हर व्यक्ति गैर-जिम्मेदार नहीं होता और स्वतंत्र पत्रकार भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए पत्रकारिता कर सकते हैं।
क्या हर नागरिक को पत्रकारिता का अधिकार है?
यह बहस ऐसे समय में सामने आई है, जब सोशल मीडिया ने समाचारों और घटनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के तरीके को बदल दिया है। मोबाइल कैमरे के जरिए नागरिक किसी घटना को रिकॉर्ड कर सकते हैं और उसे सार्वजनिक कर सकते हैं। इससे सूचना के प्रसार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन गलत जानकारी, अधूरे तथ्यों और सनसनीखेज प्रस्तुति की चुनौतियां भी सामने आई हैं।
सुप्रीम कोर्ट में हुई चर्चा ने इस सवाल को प्रमुखता से सामने रखा है कि पत्रकारिता की पहचान केवल कैमरा या माइक्रोफोन रखने से तय होनी चाहिए या इसके साथ पेशेवर जिम्मेदारी, तथ्यात्मक सटीकता और जवाबदेही को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
फिलहाल, इस सुनवाई में पत्रकारों और रील मेकर्स के बीच अंतर को लेकर उठे सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं। इसे पत्रकारिता की परिभाषा, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और मीडिया कर्मियों को मिलने वाले संरक्षण के व्यापक मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।

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